यूरोपियों का आगमन : डच कंपनी और ब्रिटिश कंपनी

डच कंपनी 

डच ईस्ट इण्डिया कंपनी की स्थापना 1602 में हॉलैंड में हुई। इसकी देख रेख के लिए 17 सदस्यीय बोर्ड का गठन किया गया डच सरकार का कम्पनी पर नियंत्रण था और कंपनी द्वारा की जाने वाली संधियाँ डच सरकार के नाम से की जाती थी। डच कंपनी को युध्द करने, संधि करने,  एवं क्षेत्र विस्तार करने की शक्ति सर्कार द्वारा प्रदान की गई थी। 

                                                           डचों ने बाटविया (इंडोनेशिया ) को अपना मुख्यालय बनाया। भारत स्थित डच कंपनी इसी के प्रति उत्तरदायी थी। 

                                      डचों ने भारत में कोरोमंडल तट को अपने व्यापार का आधार बनाया और मसूलीपट्नम में अपना प्रथम व्यापारिक केंद्र स्थापित किया। 

                                     डचों ने मसलों के स्थान पर भारतीय वस्त्र के निर्यात को ज्यादा महत्त्व दिया। इस तरह भारत से वस्त्र निर्यात को सर्वप्रमुख वस्तु बनाने का श्रेय डचों को दिया जाता है। अंततः 1759 में बेदरा का युद्ध में अंग्रेज ने डचों को पराजित कर दिया 

ब्रिटिश कंपनी 

1598 में अंग्रेजों ने अपनी नौसेना श्रेष्ठता स्थापित कर पूर्वी क्षेत्र में व्यापार हेतु कदम बढ़ाया इसी क्रम में 1599 में ईस्ट इण्डिया कंपनी की स्थापना की जिसे आरम्भ में 15 वर्षों के लिए व्यापारिक एकाधिकार दिया गया किन्तु आगे चलकर 1609 ई० में ब्रिटिश सम्राट जेम्स -I द्वारा इस व्यापारिक एकाधिकार को अनिश्चित काल के लिए बढ़ा दिया गया। 

           मुग़ल सम्राट जहांगीर के शासनकाल में 1608 ई० में कैप्टन हॉकिंस के नेतृत्व में अंग्रेजो ने सूरत में प्रथम व्यापारिक केंद्र की स्थापना की। 

1698 में बंगाल का सूबेदार अजीमुशान ने अंग्रेज़ों को गोविन्दपुर , सुतानती एवं कोलकाता की जमींदारी प्रदान की। इन्ही क्षेत्रों को मिलाकर जॉब चारनाक ने फोर्ट विलियम (कलकत्ता ) की स्थापना की। जिसका प्रथम प्रेसिडेंट चार्ल्स आयर था।  

            1717 में मुग़ल बादशाह फरुक्खसियर ने अंग्रेज़ों को शाही फरमान प्रदान किया। जिसके तहत उन्हें बंगाल में निःशुल्क व्यापार की अनुमति दी गई। 








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